जीवन-यात्रा
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बाल्यकाल • प्रारम्भ
बाल्यावस्था से ही भगवत्-चिन्तन
स्वामीजी का जीवन बाल्यावस्था से ही अत्यन्त शिस्तबद्ध एवं संयमित रहा। बाल्यावस्था से ही उनका मन सांसारिक विषयों से विरक्त रहकर नित्य प्रति भगवत्-चिन्तन एवं ईश्वर-आराधना में लगा रहता था।
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1972 • महापरिवर्तन
संन्यास दीक्षा एवं हठयोग-प्राणायाम
बाल्यावस्था से ही वैराग्य एवं अध्यात्म के प्रति गहन अनुराग बढ़ने के कारण 1972 में सांसारिक मोह-माया का पूर्णतः त्याग कर, स्वामीजी ने परम पूज्य प्रातःस्मरणीय अनन्त श्री विभूषित श्रीमत्स्वामी चतुर्भुजानन्द गिरि जी महाराज — हठयोग के महान् ज्ञाता एवं प्राणायाम के दृढ़ अभ्यासकर्ता — की शरण ली।
गुरुदेव ने उन्हें शिष्यरूप में स्वीकार कर संन्यास दीक्षा प्रदान की और हठयोग की दीक्षा तथा प्राणायाम का गहन ज्ञान दिया।
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गुरु आज्ञा से
तीर्थ-यात्रा एवं कठोर तपस्या
गुरु समीप कुछ काल यापन करने के बाद गुरु-आज्ञा से स्वामीजी साधना के अनुकूल विभिन्न पवित्र तीर्थस्थानों में भिन्न-भिन्न अनुष्ठानों में रत हुए। गंगा तट पर उन्होंने प्रातःकालीन स्नान, गायत्री जप, हठयोग एवं प्राणायाम का निरन्तर अभ्यास किया — कभी एकान्त में, कभी भीड़भाड़ वाले घाटों पर, किन्तु सदा एकान्त-चित्त होकर साधना में लीन रहे।
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गत 28 वर्षों से
हरिद्वार निवास, सेवा और साधना
गत 28 वर्षों से स्वामीजी महाराज धर्मनगरी हरिद्वार में निवास कर जीवमात्र की सेवा करते हुए निरन्तर साधनारत हैं।
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आज
तत्त्वमसि आश्रम की स्थापना
आश्रम केवल इमारत नहीं — अपितु एक साधना-पीठ एवं सेवा-भूमि है, जहाँ संन्यासी, गृहस्थ, पुरुष, स्त्री — प्रत्येक को अपने अधिकार से ईश्वर-प्राप्ति का सुलभ मार्ग मिले।
"वह परमात्मा तू ही है"
सनातन धर्म की यह मूल अद्वैत भावना ही तत्त्वमसि आश्रम की स्थापना का आधार है — प्रत्येक जीव में नारायण का दर्शन करते हुए इसे लोक-सेवा के रूप में जीवित करना।
व्यक्तित्त्व एवं शिक्षाएँ
निश्छल एवं वत्सल हृदय
स्वामीजी का व्यक्तित्व अत्यन्त निश्छल एवं प्रेमपूर्ण है। साधकों तथा अध्यात्म-जिज्ञासुओं से उन्हें विशेष वात्सल्य एवं स्नेह है।
अनुशासन में प्रेम
वे अत्यन्त मृदुभाषी हैं, किन्तु समय-पालन एवं नियम-अनुशासन उनके जीवन का अविभाज्य अंग है। वही शिक्षा वे अपने अनुयायियों को भी देते हैं।
रोगी एवं निर्धन के प्रति करुणा
उनसे किसी भी प्राणी का दुःख देखा नहीं जाता। जो भी उचित आवश्यकता लेकर आश्रम के द्वार पर आता है, उसे वे कभी निराश नहीं लौटाते।
जीवन्मुक्त आचरण
इस वरिष्ठ आयु में भी उनकी नित्य-साधना, स्वावलम्बन और सहज जीवन-शैली समस्त साधकों के लिए एक जीवन्त प्रेरणा है।
— स्वामीजी का आदेश“साधु-संतों के क्षण एवं अनाज के कण को कभी बर्बाद नहीं होना चाहिए।
— स्वामीजी का प्रवचन“जो मनुष्य समय का मूल्य नहीं करता, समय भी उसका मूल्य नहीं करता।
सुखी जीवन के सरल उपाय
पूज्य स्वामीजी महाराज ने प्रत्येक साधक एवं गृहस्थ के आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक तापों की शान्ति और सच्चे आनन्द की प्राप्ति हेतु शास्त्र-सम्मत एवं अत्यन्त सरल दैनिक नित्य-कर्म विधि संकलित की है। प्रतिदिन मात्र 30 से 40 मिनट का यह नियम जीवन को दिव्यता एवं शान्ति से भर देता है:
"उनके सान्निध्य में पधारने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनत्व एवं आत्मीयता अनुभव करता है।"
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